वैश्विक स्तर पर भाल की बिंदी बनती हिन्दी

(14th September/ Fourth Point Delhi)


मैथिलीशरण गुप्त ने कहा था, “हिन्दी उन सभी गुणों से अलंकृत है जिनके बल पर वह विश्व की साहित्यिक भाषाओं की अगली श्रेणी में सभासिन हो सकती है”

प्रत्येक वर्ष १४ सितम्बर को विश्व हिन्दी दिवस मानते हुए हमें अत्यंत हर्ष के साथ-साथ गर्व भी होता है कि हमारी हिन्दी भारतवर्ष ही नहीं अपितु समस्त विश्व में एक अंतरराष्ट्रीय भाषा के रूप में स्थापित और सम्मानित हो रही है। यह दिवस मनाने का उद्देश्य हिन्दी के प्रचार-प्रयास के लिए जागरूकता पैदा करना है। १४ सितंबर १९४९ को संविधान सभा में सह-सम्मति से हिन्दी को राजभाषा का दर्जा दिया गया था।

जब भी हम कहते है, ‘हिन्दी हैं हम, वतन हैं हिंदुस्तान हमारा’ तो रोम-रोम में गर्व-भाव प्रवाहित होने लगता हैं। हिन्दी एक ऐसी भाषा जो हम सभी भारतवासियों को एकसूत्र में बांधे रखती हैं। देश के ७७% लोह हिन्दी में लेखन ,पठन, वार्तालाप और हिन्दी की समझ रखते हैं। यहीं नहीं कई राज्यों में सरकारी एवं अन्य औपचारिक कार्य भी हिन्दी में ही होते हैं। किन्तु देश के कई राज्यों में हिन्दी भाषा को राजभाषा बनाने को लेकर अब तक कोई सहमति नहीं बनी है। अंतत: ऐसे राज्यों के लिए हिन्दी एवं उनकी राजकीय भाषा के साथ-साथ अंग्रेजी को भी शासकीय भाषा की श्रेणी में रखा गया। भारतीय हिन्दी सिनेमा-जगत और हिन्दी-साहित्य ने हिन्दी के प्रचार-प्रसार में अपनी भूमिका बखूबी निभाई है। हिन्दी गीत-संगीत तो सारे विश्व में लोकप्रिय है। हिन्दी फिल्मी गाने तो विदेशियों के होठों पर थिरकते हैं। हिन्दी फिल्में विदेशों में बड़े प्यार के साथ देखी जाती हैं।

हम सभी हिंदुस्तानियों की मातृभाषा चाहे कोई भी हो लेकिन बोलचाल और अभिव्यक्ति के लिए हिन्दी से अच्छी कोई भाषा ही नहीं क्योंकि यह एक ऐसी भाषा है जो एक बच्चे से लेकर सब्जीवाला, दूधवाला या कोई भी दुकानदार हो या वाहन-चालक, इन सबसे हमें जोड़े रखती हैं। संभाषण के लिए हिन्दी ही एकमात्र भाषा है, हालांकि अँग्रेजी-प्रिय लोगों के लिए यह दूसरी भाषा है किन्तु यह केवल कहने के लिए क्योंकि अंततः घर पर तो लगभग हम सभी भारतीय हिन्दी में ही बात करते हैं। अँग्रेजी में बात करने वाले कितने लोग होंगे, यह एक मुद्दा हैं।

हिन्दी दिवस पर प्रति वर्ष कई आयोजन, समारोह होते हैं । हिन्दी-सम्मेलन विदेशों में भी होते है। हिन्दी की महत्ता पर इन आयोजनों में बड़े-बड़े व्याख्यान दिये जाते हैं लेकिन दूसरे ही दिन हम हिन्दी भाषा की उपेक्षा में लग जाते हैं। ‘हिंगलिश’ आजकल बड़ी लोकप्रिय हो रही है और वार्तालाप में इसका चलन बढ़ने के कारण हम न ठीक से हिन्दी बोल पाते हैं न ठीक से अँग्रेजी। हिन्दी के प्रत्येक वाक्य में अँग्रेजी का अतिक्रमण होता ही हैं। आज़ादी मिले हुए बरसों हो गए लेकिन मानसिक गुलामी की जंजीरों में हम अब भी जकड़े हुए हैं। जबकि विदेशों में उनके स्कूलों और विश्वविद्यालयों में हिन्दी को विशेष दर्जा देकर उनका अध्ययन हो रहा हैं और काफी संख्या में विदेशों में छात्र हिन्दी भाषा के अध्ययन की ओर आकृष्ट हो रहें है। जबकि भारत में अब भी अँग्रेजी माध्यम में बच्चों को पढ़ाने की लालसा समाज के सभी वर्गों में जस की तस हैं। हालांकि शिक्षा क्षेत्रों में ऐसे कई विषय है जैसे मेडिकल हो या इंजीनीयरिंग इनके लिए हिन्दी भाषा में पढ़ना और पढ़ाना, तकनीकी रूप से बहुत ही कठिन होगा।

हिन्दी भाषा दुनिया में बोली जाने वाली सबसे बड़ी चौथी भाषा है, पहले नंबर पर चीनी भाषा का स्थान है। वर्ष २०११ में हुए भाषाई सर्वेक्षण के आधार पर भारत में लगभग ४२ करोड़ लोगों की मातृभाषा हिन्दी है पर इसके अलावा भारत के करीब २०-३० करोड़ और भाषा भाषाई भी हिंदी बोलने में काफी माहिर हैं। इस प्रकार लगभग ७०-८० करोड़ लोग साधारण हिंदी बोल सकते हैं और एक दूसरे से संवाद स्थापित कर पाते हैं। यह भी एक सच है कि भारत में अभी भी अंग्रेजी बोलने वालों को अलग नज़र से देखा जाता है पर यह भ्रांतियाँ अब मिटानी होगी क्योंकि विद्वत्ता का मापदंड भाषा नहीं, अपितु ज्ञान होता है। अभी भी कई सरकारी और निजी कार्यालयों में सभी कार्यालयीन कामकाज अँग्रेजी में होता है जबकि कई लोगों को अँग्रेजी नहीं आने से उन कामकाजों को निपटाने में परेशानी होती हैं।

आज ४० से अधिक देशों के ६०० से अधिक विश्व-विद्यालयों और स्कूलों में हिन्दी को एक भाषा के रूप में पढ़ाया जा रहा हैं। मारीशस और फिजी में हिन्दी एक विषय के रूप में वर्ष १९५० से पढ़ाई जा रहीं हैं। यहीं नहीं विदेशों से कई वर्षों से हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं का नियमित प्रकाशन हो रहा है, यह हम भारतीयों के लिए बहुत ही गर्व की बात हैं। जहां समस्त विश्व में हिन्दी भाषा को सम्मानित किया जा रहा है, उसे पढ़ाया जा रहा है, ऐसे में अपने ही हिंदुस्तान में हिन्दी को बचाने की जद्दोजहद बड़ी गंभीर स्थिति को दर्शाती है। यह देखा गया है कि हिन्दी बोलने में अधिकतर भारतीय सहज होते हैं, स्पष्ट होते हैं किन्तु लिखने में फिसड्डी होते है। इसके लिए स्कूलों में बच्चों के भीतर हिन्दी भाषा को लेकर अंग्रेजी की तरह ही रुचि उत्पन्न की जानी चाहिए। हिन्दी को अब राजभाषा नहीं राष्ट्रभाषा का दर्जा मिलना ही चाहिए। समय आ गया है जब आधुनिक भारत के विस्तृत पटल पर तकनीकी रूप में भी हिन्दी भाषा अपने पूरे गरिमा के साथ स्थापित होगी। आज हिन्दी भाषा वैश्विक परिदृश्य में अपनी गरिमामयी स्थान के साथ सुसज्जित है, यह हम भारतीयों के लिए सौभाग्य की बात है।

डॉ सुषमा गजापुरे ’सुदिव’ / दिनेश कुमार वोहरा
(स्तम्भ लेखक वैज्ञानिक, आर्थिक और समसामयिक विषयों पर चिंतक और विचारक है )
write1966@gmail.com

लेखिका स्थापित रचनाकार,चिंतक,शिक्षाविद् और वरिष्ठ पत्रकार है

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